शुक्रवार 2 अक्टूबर 2026 - 22:24
पति-पत्नी के अधिकारों की अदायगी, नमाज़ की पाबंदी और दुश्मन के मुकाबले सतर्कता धार्मिक जिम्मेदारी है: मौलाना सय्यद मुहम्मद सफवी

अंजुमन-ए-शरई शियाान दारुलमुस्तफ़ा के तत्वावधान में पुरानी इमामबाड़ा हसनाबाद, श्रीनगर में आयोजित नमाज़-ए-जुमा के इज्तेमाअ को संबोधित करते हुए हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सय्यद मुहम्मद हुसैन मूसा सफवी ने इस्लामी शिक्षाओं की रोशनी में पति-पत्नी के अधिकारों, नमाज़ की अहमियत, पारिवारिक जिम्मेदारियों तथा दुश्मन के मुकाबले सामूहिक जागरूकता और दृढ़ता की जरूरत पर विस्तार से प्रकाश डाला।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, अंजुमन-ए-शरई शियाान दारुलमुस्तफ़ा के तत्वावधान में पुरानी इमामबाड़ा हसनाबाद, श्रीनगर में आयोजित नमाज़-ए-जुमा के इज्तेमाअ को संबोधित करते हुए हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सय्यद मुहम्मद हुसैन मूसा सफवी ने इस्लामी शिक्षाओं की रोशनी में पति-पत्नी के अधिकारों, नमाज़ की अहमियत, पारिवारिक जिम्मेदारियों तथा दुश्मन के मुकाबले सामूहिक जागरूकता और दृढ़ता की जरूरत पर विस्तार से प्रकाश डाला।

मौलाना सय्यद मुहम्मद सफवी ने कहा कि इस्लाम ने वैवाहिक जीवन को केवल एक सामाजिक रिश्ता नहीं, बल्कि अधिकारों और कर्तव्यों पर आधारित एक जिम्मेदार व्यवस्था क़रार दिया है। उन्होंने कहा कि पत्नी पर पति के अनिवार्य शरीअती अधिकारों का पालन, वैवाहिक अधिकारों को शरीअत की सीमाओं के भीतर पूरा करना, वफादारी और पाकदामनी, पति के राज़ तथा सम्मान और प्रतिष्ठा की रक्षा, सम्मान और अच्छे व्यवहार, वित्तीय अमानतदारी तथा पारिवारिक मामलों में सहयोग महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं।

उन्होंने आगे कहा कि बच्चों की परवरिश में आपसी सहयोग, घर के माहौल में शांति और सुकून बनाए रखना तथा एक-दूसरे के साथ धैर्य, क्षमा, दरगुज़र और नरमी का व्यवहार अपनाना एक मजबूत और शांतिपूर्ण परिवार की बुनियाद है।

खुतबा-ए-जुमा के दूसरे हिस्से में नमाज़ की अहमियत पर प्रकाश डालते हुए मौलाना सय्यद मुहम्मद सफवी ने कहा कि नमाज़ केवल कुछ हरकतों और अज़कार का नाम नहीं, बल्कि इंसान की अपने परवरदिगार के सामने बंदगी और उसके साथ आध्यात्मिक संबंध का व्यावहारिक इज़हार है।

उन्होंने कुरआन मजीद में नमाज़ को छोड़ने के संबंध में दी गई चेतावनी और अहले बैत (अ) की शिक्षाओं का हवाला देते हुए कहा कि नमाज़ को जीवन में गौण स्थान देना इंसान की धार्मिक चेतना को कमजोर करता है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि नमाज़ को केवल एक औपचारिक या मजबूरी के फर्ज के रूप में नहीं, बल्कि अल्लाह तआला से दिली संबंध और आध्यात्मिक मुलाकात के रूप में अदा किया जाना चाहिए। नमाज़ समय पर, इत्मीनान, खुज़ू और मारफ़त के साथ कायम की जानी चाहिए, क्योंकि नमाज़ की गंभीरता से पाबंदी इंसान के भीतर तक़वा और व्यावहारिक सुधार की बुनियाद को मजबूत करती है।

मौलाना सय्यद मुहम्मद सफवी ने दुश्मन की साजिशों और चुनौतियों के संदर्भ में सामूहिक जागरूकता, सतर्कता और दृढ़ता को भी धार्मिक और सामाजिक जिम्मेदारी करार दिया।

उन्होंने कहा कि दुश्मन के मुकाबले बुनियादी आवश्यकता यह है कि लोग अपनी सफ़ो में एकता और एकजुटता बनाए रखें, हर प्रकार की साजिश और नकारात्मक प्रचार के मुकाबले सतर्क रहें तथा समाज में ज्ञान, आत्मविश्वास, अनुशासन, आपसी सहयोग और आंतरिक क्षमताओं को मजबूत करें।

उन्होंने कहा कि धार्मिक चेतना, नैतिक स्थिरता और सामूहिक जिम्मेदारी ही वे तत्व हैं, जो समाज को बाहरी दबाव और विभिन्न चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए मजबूत बनाते हैं।

टैग्स

आपकी टिप्पणी

You are replying to: .
captcha